क्वार्टर लाइफ अर्थात चौथाई जीवन


हमारे युग का नायक , मित्रों, एक पोर्ट्रेट है, लेकिन किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि हमारी पीढ़ी के सभी दुर्गुणों का जो चरम विकास पर हैं 

ए हीरो ऑफ़ आवर टाइम। रूसी रूमानी लेखक, कवि और चित्रकार मिखाइल लेरमोंटोव (1814-1841)

कुछ रचनाएं, कुछ किताबें मन में ठहर जाती है।

आप कह सकते हैं कि उनकी ओर बार बार लौटने का मन करता है, निश्चित ही उनकी यह खासियत इस वजह से पैदा होती है कि वह आप के मन के कुछ तारों को छेड़ने में कामयाब होती हैं, आप की दुखती रग को कहीं छू देती हैं।

देविका रेगे  के पहले उपन्यास ‘क्वार्टरलाइफ’ के बारे में मैं यही कह सकता हूं।

क्वार्टरलाइफ अर्थात चौथाई जीवन। उम्र का वही पड़ाव जब आप को पहली बार एहसास होता है कि आप की अपनी ‘राय होने की क्या खुशी होती है’। भविष्य को लेकर चिन्ता भी होती है, पसोपश भी होते हैं, जिन्दगी के दूरगामी निर्णय लेने के जबरदस्त दबाव में होते हैं, खुद पर ही संदेह, खुद की खोज का यह दौर होता है। इस अलग से लगनेेवाले शीर्षक की पहेली किताब के अंत में खुलती जाती है जब आप उपन्यास के आखिरी हिस्से तक पहुंचते हैं और फिर यह बात जाहिर होती है कि इसके सभी प्रमुख किरदार अपने जीवन का लगभग  चौथाई  हिस्सा पूरे कर चुके हैं।

गौरतलब है कि विगत एक दहाई से अधिक समय से हम सभी ने अपने इर्दगिर्द, अपने व्यक्तिगत-सामाजिक जीवन में जबरदस्त उलटफेर होते देखा है, जिनका असर हमारे अपने आत्मीय सम्बन्धों पर, रिश्तेदारियों पर और यहां तक अपने परिवेश में भी देखा जा सकता है और इनके आगाज़ को भले ही एक दहाई से अधिक समय पहले हुए राजनीतिक बदलाव के साथ जोड़ें, जब हिन्दुत्व वर्चस्ववादी ताकतें सियासी तौर पर ताकतवर होकर उभरी हैं , मगर उनके आगमन ने गोया समूचे समाज को झकझोर दिया है और मनुष्यता, प्रेम, आपसी सदभाव, करूणा जैसी शाश्वतसी लगनेवाली बातों की तरफ भी नए ढंग से , शंका – संदेह से देखा जा रहा है।

निश्चित तौर पर भारत की इन सियासी-समाजी तब्दीलियों को एक चमत्कार के तौर पर नहीं देखा जा सकता, वह सतह के नीचे निश्चित ही रफ्ता-रफ्ता आकार ग्रहण कर रहे होंगे, लेकिन यह बात तो तय है कि अधिकतर लोगों को विस्फोट की तरह प्रतीत होने वाले इन परिवर्तनों का अंदाज़ा भी नहीं था।

गौरतलब यह भी है कि ऐसे उलटफेर महज हमारे मुल्क की सरहदों तक सीमित नहीं है, दुुनिया में गोया ऐसी उल्टी हवा ही चली है जिसे मशहूर लेखक पंकज मिश्रा ‘एज ऑफ़ एंगर’अर्थात ‘क्षुब्ध होने का दौर’ कहते हैं।

उपन्यास का फलक वही है, जब ‘बेहद विभाजनकारी चुनावों के बाद इंडिया में भारत पार्टी हुकूमत में आयी है !

किताब के केन्द्र में तीन पात्र हैं। नरेन आगाशे, अमांडा और नरेन का छोटा भाई रोहित । उपन्यास की शुरूआत में ही आप नरेन आगाशे से मिलते हैं – जो अमेरिका के काॅर्पोरेट सेक्टर में अपनी करियर में अब ठहराव महसूस कर रहा है। यूं तो उसे आठ साल के निवास के बाद ग्रीन कार्ड भी मिल चुका है, जो वहां किस्मत आजमाने के लिए पहुंचने वाले भारतीयों का एक सपना होता है, मगर रफ्ता-रफ्ता उस समाज में तेज होती जा रही संकीर्ण आवाज़ों से घुटन महसूस कर रहा है और भारत लौट रहा है।

वैसे उसकी भारत वापसी उत्साह से भरी है, वह कुछ नया करने के मूड में अब है क्योंकि उसने सुना है कि देश में ‘भारत पार्टी’ को पूर्ण बहुमत मिल चुका है ‘और उसने हुकूमत की बागडोर संभाली है और कथित तौर पर मुल्क अब एक नया पन्ना पलट रहा है, जहां एक निर्णायक नेतृत्व  में अब आर्थिक प्रगति को तथा विकास का नया दौर शुरू होने वाला है। 

नरेन आगाशे की अपनी इस वतन वापसी में उसके साथ कभी उसकी क्लासमेट तथा रूममेट रह चुकी अमेरिकी युवति अमाण्डा भी है, जिसे मुंबई के ही किसी विशाल मुस्लिम बहुल झुग्गी वाले इलाके में सक्रिय किसी एनजीओ की तरफ से लेखन के लिए एक फेलोशिप मिली है और वह भारत देखना – समझना चाह रही है, वहां अमेरिका के न्यू इंग्लैंड में उसके अपने परिवारजन है, उसकी दादी भी है और उसका प्रेमी भी है – जो इन दिनों उन्हीं के घर पर रह रहा है।

और नरेन का छोटा भाई रोहित भी है, एक नवोदित फिल्मकार जिसका अपना स्टुडिओ है और जो घिसीपीटी बाॅलीवुड फिल्मों की बजाय कुछ नयी फिल्म बनाना चाहता है और जिसने अपने इर्दगिर्द दोस्तों – सहयोगियों की एक ऐसी टीम खड़ी की है, जो अलग-अलग समुदायों से हैं जिसमें उत्तर प्रदेश से आया ज्ञान भी है जो फिल्मांकन संभाल रहा है और उसकी मित्रा इकरा भी है, जो किसी संपन्न मुस्लिम परिवार से जुड़ी है, और जिसे वर्ल्ड बैंक के किसी प्रोजेक्ट के लिए विदेशों में जाने का आफर भी है , मगर वह यहां अपने सामाजिक सरोकारों के कारण गयी नहीं है। दोनों इस बात से भी चिंतित हैं मुल्क में ऐसे शख्स के हाथों में हुकमत आयी है जिसका विवादास्पद अतीत रहा है, ‘जिसके हाथ मासूमों के खून से रंगे हुए हैं।’

पारसी समुदाय से जुड़ा साइरस भी है, जिसके जय से अधिक अंतरंग रिश्तों को लेकर उसके परिवार में बढ़ती चिंताएं भी हैं।

मुल्क में बदलती हवाओं का गोया रोहित पर भी असर होता है और वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों को ढूंढने  गांवों की तरफ निकल पड़ता है जहां हिंदू राष्ट्रवादी आन्दोलन से नजदीकी से जुड़े उग्र युवाओं से उसका साबिका पड़ता है, रोहित की इस यात्रा को ओंकार से जुड़ाव ने प्रेरित किया है। ओंकार पिछड़ी जाति से जुड़ा हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रतिबद्ध कार्यकर्ता है, जो पुणे के पास स्थित वाई का रहनेवाला है।

उपन्यास बम्बई, बाॅम्बे या अब आमची मुंबई या पश्चिमी भारत के आसपास के परिवेश की प्रष्ठभूमि में आगे बढ़ता है, जिसमें प्रमुख राजनीतिक किरदार हिन्दुत्व विचारों की वाहक ‘भारत पार्टी’ ही नहीं है, सूबे में मराठी अस्मिता के लिए प्रतिबद्ध कहनेवाली ‘मराठी बाना’ पार्टी भी है, जिसके भारत पार्टी के साथ आपसी सहयोग और आपसी प्रतिस्पर्द्धा  के भी रिश्ते हैं।

उपन्यास के पन्नों पर आप ‘पहचान की राजनीति सेे लेकर काॅपोरेट लूट और आदर्शवाद की सीमाएं, इन सभी की छटाओं को देख सकते हैं। उपन्यास के यह सभी किरदार अपने आप में भारत के इस बदलते रूप का एक अंश लेकर चल रहे हैं। जैसे-जैसे वह न्यू इंडिया से टकराते हैं, वह उस गहरे में विभाजित और जटिल वातावरण के बारे में सचेत होते जाते हैं। नतीजा होता है कि लगातार विस्तारित होती एक कहानी जो उत्सव की एक रात तक उरूज तक पहुंचती दिखती है, जब समूची बंबई सड़कों पर है और सुषुप्त असंतोष फूट पड़ता है।’

प्रस्तुत उपन्यास को आप कई कोनों से / कई स्तरों पर पढ़ सकते हैं: आप उसे नब्बे के दशक की प्रष्ठभूमि में पुणे के किसी मध्यमवर्गीय इलाके में रह रहे चित्पावन ब्राहमण आगाशे परिवार की विकासयात्रा के तौर पर देख सकते हैं। याद रहे यही वह कालखंड है जब आर्थिक सुधारों का आगाज़ हुआ जिसने समाज में एक अलग किस्म की आर्थिक विकास के दरवाजे खोले थे। परिवार के बड़े भाई ने कोंकण की अपने हिस्से की पुश्तैनी जमीन ‘ब्रहमा माईन्स’ को बेच कर हासिल की संपन्नता का मसला भी है और जो अब मुंबई के नवधनाढयों के एक इलाके के इंपीरियल हाईटस नामक अपार्टमेंट में स्थानांतरित कर चुका हैं जबकि छोटा भाई अपनी पत्नी के साथ वहीं पुणे में पुश्तैनी मकान में स्थित हैं और उनका आदर्शवादी पत्रकार बेटा केदार भी है, जो इस आर्थिक प्रगति की दिशा पर गहरे सवाल उठा रहा है जिसे पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ की चिन्ता है और अपने उसूलों के लिए बड़ी से बड़ी कीमत भी चुकाने को तैयार है।

आप चाहे तो उसे अमांडा की निगाहों से, जो देवनार की मुस्लिम बहुल झुग्गी बस्ती के इलाके में सक्रिय ग्लोबल एनजीओ ‘आश्रय फाउंडेशन’ पहुंची है, महसूस सकते हैं। बस्ती में दलितों की भी आबादी है और वहां जमीनी स्तर पर दलितों एवं मुसलमानों के तनाव की लहरों को भी देखा जा सकता है। अमांडा धीरे-धीरे रोहित को चाहने भी लगती है और साथ-साथ इस द्वंद से भी गुजरती रहती है कि उसका अमेरिकी प्रेमी वहीं उसके घर में ही इन दिनों रह रहा है।

आप चाहें तो गणेशोत्सव के दौरान इंपीरियल हाईटस के आगाशे के मकान में जमा नरेन, रोहित को मित्रों, परिचितों, सहयोगियों के बीच देश के सूरते हालात को लेकर जारी लम्बे संवाद में – जिसका विस्तार लगभग तीस से अधिक पन्नों तक है – इस उपन्यास की धड़कनों को सुन सकते हैं। यह ऐसी बहसें है जिससे हम सभी अक्सर गुजरते रहे हैं, जिन्होंने कई बार हमारी बचपन से चली आ रही दोस्तियों में भी दरार डाली है, आत्मीय रिश्तों में भी एक खटास पैदा की है।

या आप वाई के रहनेवाले पिछड़ी जाति से सम्बद्ध और हिन्दुत्व की राजनीति में सराबोर ओंकार के चरित्र में पढ़ सकते हैं, या 2014 में हुकूमत संभाली भारत पार्टी / सुज्ञ पाठक समझ सकते हैं कि किसकी चर्चा हो रही है/ और महाराष्ट में मराठी हितों के लिए प्रतिबद्ध कहनेवाली ‘मराठी बाना’ पार्टी के इरादों, संकल्पों और आपसी प्रतिस्पर्द्धा  में भी देख सकते हैं।

उपन्यास की खासियत उसके फॉर्मेट में भी है जो कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसके अलग अलग शीर्षक हैं: एंजाइटी, ट्रांसफॉर्मेशन, स्टेलमेट, एटमॉस्फेयर, विजिल, रिलीज़ और इन हिस्सों के अलग-अलग अध्यायों को किरदारों के शीर्षक दिए गए हैं, जहां उनके जीवन पर फोकस करके आसपास के घटनाक्रम को देखा गया है। गौरतलब है कि यह सभी आपस में अंतर गुंथित भी हैं और अलग अलग भी हैं।

लेखिका के वैचारिक सरोकार साफ हैं – जो उसके कई साक्षात्कारों में प्रगट होते हैं – लेकिन पात्रों के चित्रण की संश्लिष्टता में उन्होंने बिल्कुल वस्तुनिष्ठता बरती है, इसलिए आप पात्रों को समग्रता में देख पाते है, उनकी अपनी विकास यात्रा को समझ पाते हैं। दोस्तोयवेस्की के चरित्रों की तरह न उनके चरित्रों में अच्छे और बुरे दोनों तत्वों को चिन्हित किया जा सकता है। और उनके गढ़ने में एक सचेत कोशिश दिखती है कि वह कम्पोजिट/संमिश्र/सम्मिलित/ मिले जुले हों ताकि आप उनसे मिल कर महसूस करें कि कहीं आप उनके जैसे किरदार से मिले हैं और नहीं भी मिले हैं।

निश्चित ही उपन्यास की तैयारी में लेखिका ने 5-6 साल की जो मेहनत की, अलग अलग लोगों से मिलीं, दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं से लेकर सामाजिक बदलाव के लिए सक्रिय गुमनाम से रहनेवाले एक्टिविस्टों से मिलीं, उसकी छाप उनकी पात्रों की इस संश्लिष्ट संरचना पर दिखती है।

आप पाते हैं कि नरेन जैसा व्यक्ति कभी आप का अपना दोस्त रहा है, जो अपने इर्दगिर्द हो रही उथलपुथल से बेख़बर – कहीं न कहीं उसके साथ सामंजस्य कायम रखते हुए – तरक्की की अपनी सीढ़ियों को लेकर मुग्ध है, अमांडा जैसी अमेरिकी युवती से नहीं वह अपने ही सांस्कृतिक वातावरण में पली-बढ़ी मानसी को जीवनसंगिनी बनाने के लिए तैयार है।

आप समझ पाते हैं कि हिन्दुत्व के विचारों या उसके अमल का वह कैसा गतिविज्ञान है कि वह बहुसंख्यक समाज के अलग-अलग तबकों को आकर्षित करने में कामयाब हो रहा है, किस तरह वह नरेन को प्रभावित करता है या किस तरह वह रोहित को भी प्रेरित कर रहा है- उपन्यास में वही रोहित ओंकार के आगमन के बाद अचानक अपनी जड़ों को ढूँढने निकल पड़ता है। 

ओंकार पुणे से थोड़ी दूर शहर वाई का रहनेवाला पिछड़ी जाति का युवक है, जो हिन्दुत्व के विचारों का प्रतिबद्ध कार्यकर्ता है, मगर आप उसके अंतर्दद्वों के माध्यम से यह भी देख पाते हैं कि इस नए भारत में भी ऐसे लोग कहीं न कहीं इस्तेमाल ही होते हैं।

आप केदार के समर्पण के जज्बे को समझ पाते हैं कि किस किस्म की स्थितियां बनती जा रही हैं कि आसपास घटित हो रही चीजों की यथार्थवादी रिपोर्टिंग करना लगभग असंभव होता जा रहा है या आप कोंकण के इलाके में ब्रहमा माईन्स की नयी परियोजना को लेकर आयोजित जनसुनवाई में शामिल सलमान आदि के जरिए उन तमाम आवाजों से रूबरू होते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सक्रिय हैं।

उपन्यास इस प्रश्न को भी खुला छोड़ता है कि उसकी ‘असफलता’ / उपन्यास में अपनी खोजी पत्रकारिता के चलते उसकी हत्या होती है/ किसकी असफलता है, उसकी अपनी या इस दौर की !

उपन्यास महज इस दौर में हावी होती जा रही नकारात्मकता का बयान भर नहीं है बल्कि वह इस परिघटना को धीरे-धीरे उकेरने का भी प्रयास है कि निहायत दक्षिणपंथी विचार भी किस तरह सामाजिक मानस में अपनी जगह बना लेते हैं, जिसमें उनके वाहक हमारे आप के जैसे सामान्य से लोग ही होते हैं।

मार्क्स ने कहीं लिखा है कि ‘विचार जब जनसमुदाय द्वारा ग्रहण किए जाते हैं तो वह भौतिक शक्ति बनते हैं’, निश्चित तौर पर उन्होंने सर्वहारा की ताकतों के बारे में यह बात लिखी थी, मगर यही बात दक्षिणपंथ के वर्चस्व के संदर्भ में भी देखी जा सकती है।

मुझे याद है कि साठ-सत्तर के दशक में प्रख्यात नाटककार विजय तेंडुलकर का एक मराठी नाटक चर्चित हुआ था ‘अशी पाखरे येती’ / जिसका बाद में हिन्दी में ‘पंछी ऐसे आते हैं’ शीर्षक से अनुवाद और प्रस्तुतीकरण भी हुआ/ जिसमें नायिका का भाई संघ का स्वयंसेवक दिखाया गया था जिसके सम्वाद, जिसकी सक्रियताओं के चलते मंच पर उसके महज आगमन से पूरे सभागार में हंसी का फव्वारा छूटता था, मगर प्रस्तुत उपन्यास में ओंकार  जैसे लोगों का चित्रण कहीं से भी कैरिकेचर नहीं लगता, हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति को लेकर उसके तर्क नरेन और रोहित जैसे लोगों को भी प्रभावित करते दिखते हैं।  

उपन्यास को लेकर एक बात दिलचस्प लगीं कि उपन्यास का औपचारिक अंत नहीं होता है। आप उपन्यास के लगभग आखरी अध्याय में अमांडा से मिलते हैं जो अमेरिका लौट आयी है और मुंबई के गणेशोत्सव के हंगामें में जहां वह रोहित के साथ पहुंची थी, जहां वह घायल हुई है और उसके माता-पिता उसके इलाज में मुब्तिला हैं। और उपन्यास के बिल्कुल आखरी अध्याय बिना शीर्षक के है जहां आप लेखिका से खुद मिलते हैं जो अपने पिता की अस्थियाँ विसर्जित करने वाराणसी आयी है – वहीं पिताजी जिन्होंने उसके अंदर विवेकवाद के मूल्यों को बढ़ावा दिया था – और इस यात्रा के दौरान भी उसके किरदारों का जिक्र आता रहता है।

जाहिर है लेखिका ने इस अंत को पाठक पर छोड़ दिया है कि वह इस उपन्यास को आगे कैसे देखते हैं गोया उसने आज के भारत का एक जटिल एक्सरे पेश किया है और पाठकों से ही कह रही है कि इस परिद्रश्य के बारे में आप की क्या राय है। 

निश्चित ही यह लेखिका का सोचा हुआ फैसला है कि वह पाठक को भी अपने साथ शामिल करे या खुद उसके साथ मिल जाए, हालात की व्याख्या करने में।

इस संदर्भ में मुझे बिल्कुल एक अलग किस्सा याद आया पिकासो और उनकी ऐतिहासिक युद्धविरोधी पेंटिंग गुएर्निका का। 

कहा जाता है कि कोई नात्सी अधिकारी पिकासो की पेंटिंग देखने आया था। पूरी पेंटिंग देखने के बाद उसने पिकासो से पूछा यह तुमने बनायी। पिकासो का जवाब था ‘मैंने नहीं तुमने बनायी।’

लेखिका गोया यह कहना चाह रही हो कि हम सभी पाठक और रचनाकार सभी इस मौजूदा सूरतेहाल में शामिल हैं – कथित न्यू इंडिया के निर्माण के इस शोरगुल में जूनून के साथ जुड़े है या बिल्कुल उदासीन है, सबकुछ नियति मान कर चल रहे हैं या  ज्ञान, इकरा, केदार, सलमान जैसे भी हैं जो इसे फासीवाद की आहट के तौर पर देख रहे हैं। यह भी इसी दौर की निशानी है कि उनके तमाम सरोकारों , सक्रियताओं की प्रभावोत्पादकता कम होती दिख रही है ।

वैसे यह सवाल भी खुला है कि क्या इस उपन्यास का कोई दूसरा अंत मुमकिन भी था? शायद नहीं ! उपन्यास को जबरन सुखांत में बदलने की कवायद न केवल हास्यास्पद होती और सच्चाई से तौबा करने की मानसिकता का  प्रतीक होती ।

साहित्य की दुनिया से जिवंत रिश्ता न होने के चलते मेरा यह दावा कत्तई नहीं है कि प्रस्तुत टिप्पणी इस उपन्यास की समीक्षा है, आप इसे अधिक से अधिक पुस्तक परिचय कह सकते हैं या एक पुस्तक प्रेमी पाठक की राय!

इस बात का उल्लेख करना मुझे जरूरी लगता है कि प्रस्तुत किताब ने मेरी बेआरामी को जरूर बढ़ा दिया।
बेआरामी इस वजह से क्योंकि विगत एक दहाई से अधिक वक्त़ से तेजी से बदल रहे मुल्क की, समाज के प्रभुत्वशाली मानस में तेजी से आ रहे बदलावों की, विचारशील सक्रिय लोगों के लिए घटते जा रहे दायरों की एक तस्वीर सामने थी, जिसे फिक्शन में बखूबी समेटा गया था।

2023 में प्रकाशित यह उपन्यास भारत के एक खास तबके में ही नहीं अंतरराष्टीय बाजारों में भी चर्चा का विषय बन चुका है। न केवल इस उपन्यास की समीक्षाएं दुनिया की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में छपी है, बल्कि अग्रणी विचारकों-समीक्षकों ने भी उपन्यास को लेकर देविका रेगे के साथ साक्षात्कार के जरिए इस उपन्यास के अलग होने पर अपनी मुहर लगायी है।  इंडियन एक्स्प्रेस ने भी अपनी समीक्षा में इसे ‘नयी जमीन तोड़ने वाले उपन्यास के तौर पर सम्बोधित किया था।

इस उपन्यास का इटालियन में भी अनुवाद हो चुका है और कई अन्य अंतरराष्टीय भाषाओं में भी अनुवाद की योजना बनी है। यह भी सुनने में आया है कि मराठी में भी इस उपन्यास का अनुवाद हो रहा है। इन तमाम चर्चाओं से बेख़बर हिन्दी या हिन्दोस्तांनी साहित्य की स्थिति दिखती है।

मुझे यह बात बेहद विचलित कर गयी कि इस उपन्यास को लेकर हिन्दी में – जो 2011 की जनगणना के हिसाब से लगभग 55 करोड़ लोगों की मातृभाषा है – जिसमें हजारों अख़बार, सैकड़ों साहित्यिक पत्रिकाएं और इससे कई गुना अधिक संख्या में साहित्य के लिए समर्पित वेबसाइट और ब्लाॅगों की संख्या है – लगभग सन्नाटे की स्थिति रही है।

हिन्दी साहित्य के कई मान्यवरों या अग्रणी समीक्षकों से मैंने यह जानने की कोशिश की, उन सभी ने मुझे जो बताया वह मुझे और बेचैन कर गया। उनका कहना था कि हिन्दी में इस उपन्यास को लेकर लगभग सन्नाटा रहा है।

इस संदर्भ में कुछ भी कहने की ना ही मेरी सलाहियत है और न ही रूचि। 

इतना तो मुझे जरूरी लगता है कि यह सवाल काबिलेगौर है। क्या इसे हिन्दी के प्रबुद्ध जनों की आत्ममुग्धता कहा जाए, उनकी कूपमंडूकता कहा जाये, जिन्हें हिन्दी के बाहर की दुनिया से कोई सरोकार नहीं है या उनके आसपास रोज बदल रहे समाज बदलते इस बदलते हालात के साथ, बदलते दौर के साथ उनकी अपनी दुरभिसंधि का द्योतक माना जाए?

यह सन्नाटा, यह चुप्पी, यह खामोशी एक संकेत तो अवश्य देती है।

(पहली बार ‘सम्मुख’ में प्रकाशित लेख का किंचित संशोधित रूप )

क्वार्टरलाइफ़

फोर्थ एस्टेट, गुड़गांव,

हार्पर कॉलिन्स का इम्प्रिंट

प्रकाशन वर्ष 2023

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